तनाव रहित परीक्षा की तयारी किस प्रकार करे
आज के समय में मुख्य समस्या है तनाव हमारे कार्यों में अक्सर बाधा का काम करता है । अधिकतर विद्यार्थी पढ़ाई के समय मुख्य रूप से परीक्षा के समय तनाव ग्रसित हो जाते हैं। थोड़ा तनाव कई बार प्रेरणा का भी काम करता है जिसे हम चिन्ता भी कह सकते हैं परन्तु अधिक तनाव हमें परेशान कर देता है।
अधिकतर विद्यार्थी परीक्षा के समय अपने पढ़ाई के घंटों को बहुत बढ़ा देते हैं व सारे दिन किताब लेकर बैठें रहते हैं। व परिणाम आने तक तनाव में रहते हैं इस भय को एक्जाम फीवर कहते हैं जरूरी है इस तनाव को हावी न होने दें।
तनाव के कई कारण है-
1. अक्सर बच्चों पर अधिक नम्बर लाने का दवाब बनाते हैं व अपने सपने उनपर थोपते हैं।
2. परीक्षा की उचित तैयारी का अभाव अक्सर विद्यार्थी पूरे साल मौज मस्ती करते है और परीक्षा के समय ही पढ़ाई करते है और परेशान रहते है।
3. स्वस्थ्य प्रतियोगिता की भावना हमारे कार्य की गुणवत्ता बढ़ाती है मगर अपनी योग्यता से अधिक आकांक्षा व दवाब हमें तनाव ग्रसित करता है ।
4. परीक्षा के बाद का समय उन विद्यार्थीयों के लिये तनाव का कारण बनता है जो अच्छी तरह पढ़ाई नहीं करते क्योंकि उनको परिणाम को लेकर अनिश्चिता होती है, और जो पूरे वर्ष अच्छी तरह तैयारी करते है वे चिन्ता रहित रहते है व अपना समय अन्य अच्छें कार्यां में लगाते है।
परीक्षा के तनाव से बचाव-
1. परीक्षा पूर्व, परीक्षा के समय व परीक्षा के पश्चात इस तनाव से बचना बहुत जरूरी है। पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी को मुख्य काम के रूप में लें व पढ़ाई की आदत डालें।
2. पढ़ाई के लिये एक टाइम टेबल जरूर बनायें व प्लान के अनुसार पढ़ाई करें टाइम टेबल में सभी विषय व कार्यों को समुचित स्थान दे।
3. पढ़ाई का वातावरण ठीक हो ऐसा वतावरण हो जो पढ़ाई में मदद दे। निश्चित स्थान पर बैठ कर ही पढ़ाई करें। प्रकाश की व्यवस्था उचित हो दिन के प्रकाश की तरह हो व सीधे आंखों पर न पडे़। टेलीविजन, संगीत शोर व्यवधान न डालें इससे बचने के लिये उचित समय पर चुनाव कर सकते है।
4. सकारात्मक सोच हमारे अन्दर एक स्फूर्ति प्रदान करती है। अतः अच्छे परिणाम व अच्छे परिणाम को सोचते हुए तैयारी करें पढ़ाई व पेपर से पहले एक अच्छी सी स्माइल अपने आपको पास करें व खुशी देने वाले विचार ही हमेशा मन में रखें पढ़ाई के बीच कुछ समय का विश्राम जरूर ले यह विश्राम याद की गई विषय वस्तु को धारण करने में मदद करता है। अपने मित्रों के बीच में विषय चर्चा से भी याद करने में मदद मिलती है।
5. पढ़ाई की सभी सामग्री पढ़ते समय पास ही होनी चाहिए ।
6. किसी भी प्रकार के व्यसन व दवा से दूर रहें यह तनाव कम करने की तनाव को अपेक्षा बढ़ाते है ।
7. स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क रहता है । अतः भोजन वह खाये जो एनर्जी दे आलस नहीं हल्का स्वास्थ्य वर्जक भोजन लें । पानी का अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए। नियमित व्यायाम को भी समय दे।
8. नींद की कमी भी तनाव पैदा करती है। नींद हमारी मानसिक व शारीरिक थकान को दूर करने में मदद करती है नींद की समय सीमा प्रत्येक व्यक्ति के लिये अलग-अलग होती है। अतः थकान दूर करने वाली नींद कई बार अधिक नींद आलस भी देती है।
9. विषय वस्तु का बार-बार अभ्यास व पुनरावृत्ति भी पाठ्य विषय को याद रखने में मदद करती है।
10. परीक्षा के समय -समय से उठकर, परीक्षा केन्द्र पर समय से पहुॅचने पर तनाव रहित रह सकते हैं। पैन, पेन्सिल, व अपना रोल नम्बर आदि सभी आवश्यक सामग्री रात को ही तैयार करके रख लें, व पहनने वाले सभी वस्त्र, जूते आदि भी पहले ही तैयार करके रखने से सुबह समय बर्वाद नहीं होता। हल्का नाश्ता करके अवश्य जाये। समय पर अपनी सीट ग्रहण कर लम्बी सांस लेकर अपने आपको फ्री करें व एक अच्छी सी स्माइल अपने आपको दें।
11. पेपर मिलने पर सकारात्मक सोच रखे कि पेपर बहुत अच्छा है व पूरा पेपर पढ़े 15 मिनट पेपर पढ़ने के लिये होते हैं। पेपर में प्रश्न समझने का प्रयास करें जो प्रश्न आता है उसे पहले करें कोशिश रहे कि एक ग्रुप के प्रश्न एक साथ किये जाये।
12. प्रश्न करने से पहले एक मिनट अपने मस्तिष्क में एक रूपरेखा बना लें कि उत्तर कैसे लिखना है उसी के अनुसार उत्तर लिखें सभी प्रश्नों को समय में बांट कर लिखे। अधिक नम्बर के प्रश्न को कुछ अधिक समय दें। इस प्रकार पूरा पेपर निश्चित समय में करने का प्रयास करें
13. प्रश्न का उचित नम्बर अपने उत्तर के सामने लिखें । व प्रत्येक प्रश्न का रिवीजन अवश्य करें। कॉपी जमा करने से पहले सभी प्रश्नों के उत्तर अवश्य दोहरा लें जिससे कोई कमी ने रह जायें उत्त समझाकर स्पष्ट शब्दों में लिखे।
14. कला वर्ग में उत्तर प्वाइंट के रूप में लिखें व हेड लाईन को इंगित करें।
एक पेपर हो जाने के बाद अधिक न सोचें व अगले पेपर की तैयारी करें।
इन सभी बातों को ध्यान रखकर हम अच्छी तरह से परीक्षा की तैयारी कर सकते हैं व अच्छे अंक प्राप्त कर तनाव मुक्त रह सकते है।
-कुसुम कुमारी
शिक्षक और समाज
हमारे समाज में गुरू का स्थान ईश्वर से ऊपर माना गया है। वह हमेशा पूज्यनीय रहा है उसको यह स्थान उसके समाज में दिये योगदानों के परिणाम स्वरूप मिला है।
शिक्षक की समाज और राष्ट्र के निर्माण में महती भूमिका होती है। उसका काम केवल स्कूली शिक्षा तक ही सीमित नहीं है। डॉ0 राधा कृष्णनन् के अनुसार शिक्षक् समाज का अच्छा शिल्पकार भी होता है, वह समाज को अच्छे नागरिक प्रशासक, डॉक्टर, इंजीनियर प्रदान करता है।
समाज के लोगों को समाज के व्याप्त विभिन्न कुरूतियों को दूर करने में मदद करता है। लोगों में अन्धविश्वास, रूढिवादी सोच को दूर करने में मदद करता है। उनमें नई जागरूकता लाने में मदद करता है ।
समाज के लोगों को नई सोच, अपनाने के लिये प्रेरित करता है नई-नई जानकारियों से समाज को अवगत कराता है। लोगों की विभिन्न समस्याओं के समाधान में उनकी मदद करता है ।समाज में जागरूकता लाने के लिये वह विभिन्न अभियान चलाता है व समाज के लोगों को उससे जोड़ता है। शिक्षक समाज के लोगों को स्वावलम्बी बनाने में भी उनकी मदद करता है ।
इस प्रकार एक शिक्षक ही सभ्य सुसंस्कृत विकसित व स्वस्थ्य समाज का निर्माण करता है।
-कुसुम कुमारी
युवा निर्माण
हमारे युवा हमारे राष्ट्र की पूंजी है और शिक्षक युवा का भविष्य निर्माता है।
ए0पी0जे0 अब्दुल कलाम के अनुसार, शिक्षक का अहम उद्धेश्य युवा मस्तिष्कों को तेजस्वी बनाना है तेजस्वी युवा धरती पर धरती के नीचे ओर उपर आसमान में सबसे सशक्त संसाधन है शिक्षक के जरिये लोग जीवन की ऊँचाईयों को छूते है, असीमित सफलता को प्राप्त करते है। माता पिता के बाद लेकिन ईश्वर से पहले शिक्षक का नाम आता है।
शिक्षक का उद्धेश्य विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण करना तथा ऐसे मूल्यों को रोपना होता है। जिससे उनकी सीखने की क्षमता में वृद्धि हो उनमें ऐसा आत्मविश्वास पैदा करना है कि छात्र कल्पना शील और सृजनशील बने। व चुनौतियों का सामना करते हुए प्रतिस्पर्धा में उतरें।
एक शिक्षक का जीवन कई दीपों को प्रज्वालित करता है । युवाओं में नेतृत्वकारी विशिष्टता की क्षमता पैदा करता है। अगर आप निष्ठावान है तो दूसरी चीज अर्थ नहीं रखती। अगर समाज में एक लाख योग्य चरित्रवान और निष्ठावान छात्र तैयार हो तो समाज को प्रत्येक पॉच वर्ष में एक सुखद अनुभव व संसाधन दिया जा सकता है। यह कार्य एक शिक्षक ही कर सकता है।
शिक्षक स्वंय भी एक रॉल मॉडल होता है। अतः पद की गरिमा रकते हुए स्वंय को उन्हीं मूल्यों को धारण करने की आवश्यकता है क्यांकि छात्र उसका अनुसरण करते है और जीवन के समर उतरते हैं।
-कुसुम कुमारी